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1/ प्रोफ़ेसर का अध्ययन-कक्ष

यह एक सर्द शाम थी। पढ़ते-पढ़ते मन उब गया तो बाहर सड़क पर निकल आया। सूर्य अभी पूरी तरह डूबा नहीं था, फिर भी सड़क किनारे के लैंप-पोस्ट जल चुके थे। एक वीरानी सी थी चारों ओर। इक्का दुक्का लोग ही रास्ते पर दिखाई दे रहे थे। मन पहले से ही थका हुआ था, उपर से एक अजीब सी ख़ामोशी माहौल को बोझिल बना रही थी। मैंने अपना आई पोड ऑन किया। इससे पहले कि ईयर-फ़ोन कानों में लगाता एक कार की आवाज़ नज़दीक आते -आते रुक गयी। विंड-सक्रीन के अंदर झांका- ओह..मिस्टर प्रोफ़ेसर। मैंने अभिवादन किया-हैलो मि. प्रोफ़ेसर। जवाब में उन्होंने कहा- कम, इफ यू आर फ्री। मैं उनके साथ हो लिया। पिछले हफ्ते एक बुक-लांच पर उनसे भेंट हुयी थी। उन्होंने बताया था कि उनकी भी एक किताब आने वाली है। मैंने पूछा तो बोले-छोड़ो किताब को, तुम्हें एक नयी चीज़ दिखाता हूं। उन्होंने कार पार्क की और अपने अपार्टमेंट में ले गए।

प्रोफ़ेसर की पूरी शख़्सियत में अजीब-सी कशिश है। वे हमेशा ही तरो-ताज़ा और किसी धुन में डूबे मालूम होते हैं।  उनका कोट, उनका मफ़लर, उनका चश्मा, उनके बिख़रे बाल और थोड़ा बेपरवाह मिजाज़, सब मिलकर उनके व्यक्तित्व को भव्य बना रहे हैं। आमतौर पर मिस्टर प्रोफ़ेसर बहुत कम बोलते हैं लेकिन जो भी बोलते हैं बहुत मार्के का। लिफ्ट में उन्होंने एक सूत्र-वाक्य जैसा कहा-लिफ्ट गतिशील होती है फिर भी हमें स्थिर बना देती है जबकि सीढ़ियां स्थिर होने पर भी हमें गतिशील बनाए रखती हैं। मैं तब तक इस वाक्य पर सोचता रहा जब तक उन्होंने फ्लैट का दरवाज़ा नहीं खोल दिया। मेरे लिए यह वाक्य किसी क्लास-नोट से कम नहीं था…।

 फ्लैट में दाख़िल होते ही सामने एक बड़ा-सा सीसे का दरवाज़ा दिखा जो हमारे प्रवेश करते ही स्वतः खुल गया। भीतर का दृश्य देखकर मैं अनोखे आश्चर्य से भर गया। होंट ख़ुद-ब-ख़ुद कह उठे ‘वाह’। मैंने बहुत अध्ययन-कक्ष देखे थे लेकिन यह तो नायाब ही था। हमने जिस दरवाज़े से प्रवेश किया था वो बंद होते ही एक विशाल डिस्प्ले में बदल गया जिस पर कोई ई-बुक स्क्रॉल होने के लिए तैयार थी। इसके ठीक सामने की दीवार एक विशाल बुक-रैक थी जिसमें दुनिया भर की किताबों का जमावड़ा था। बाएं और दाएं तरफ़ की दीवारों पर भी डिजिटल डिस्प्ले थे। एक डिस्पले में किसी फ़िल्म का दृश्य पॉज़ पर था। दूसरे डिस्पले में एक म्यूज़िक प्लेयर बहुत धीमी आवाज़ में कोई यूरोपियन सिंफनी बजा रहा था। प्रोफ़ेसर ने कमर तक उंचाई और हाथ भर चौड़ाई वाली एक दराज़युक्त टेबल पर रखे कॉफ़ी-मेकर से कॉफी निकाली और बग़ैर किसी औपचारिकता के कप मेरी ओर बढ़ा दिया और बैठने का इशारा किया। प्रोफे़सर ने बड़े इतमीनान से एक सिप लिया और कप मेज़ पर रख दिया। मैंने भी वैसा ही किया।

अध्ययन-कक्ष की दीवारों की तरह मुझे मेज़ ने भी विस्मित किया। मैंने प्रोफ़ेसर से कहा कि ऐसी मेज़ मैने पहले कभी नहीं देखी। प्रोफ़ेसर ने बताया कि दरअसल यह दो राइटिंग डेस्क और एक डायनिंग टेबल को सिर्फ़ पास-पास रख देने से बनी है; मैं अपनी ज़रूरत के मुताबिक इनका इस्तेमाल करता हूं। इस तरह किसी को डिनर पे बुलाना हो, लिखने का काम करना हो या किसी समूह या समिति को अपना काम दिखाना हो, सब यहां संभव है। यहां तक कि कुछ सीमित ऑडिएन्स वाली कॅान्फ्रेंस और सेमिनार भी मैंने आयोजित किए हैं। ऐसे में ये स्टूल बहुत काम आते हैं। उन्होंने हाथ के इशारे से बताया।  ओह, तो जिसे मैं कमरे की तीनों दीवारों के आधारों पर किया गया वुड-वर्क समझ रहा था वो बहुत सारे स्टूल थे जो आपस में सटाकर रखे गए थे। अनेक स्टूलों पर खुली हुयी किताबें रखी थीं अपनी आंखों का इन्तज़ार करती हुईं। हर स्टूल में दो दराजे़ं  थीं। इन्हीं दराज़ों की वजह से मुझे वुड-वर्क का भ्रम हुआ था। मैं प्रोफ़ेसर की सादगी और मेधा का कायल हो गया। मैंने सम्मान में सिर झुका दिया-हैट्स ऑफ टू यू सर। प्रोफ़ेसर ने शुक्रिया कहा और हंसे-तुम्हें ये मज़ाक लगेगा लेकिन अगर मैं इन सारे स्टूलों को मिला दूं तो यह स्टडी-रूम एक आईडियल बेड-रूम में भी बदल सकता है। मेरी कल्पना को एक और झटका लगा।

प्रोफ़ेसर ने कॉफी ख़त्म की और अपना लैपटॉप ऑन करते हुए बोले- अब मैं तुम्हें उस चीज़ के बारे में बताने जा रहा हूं जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया था। लैपटॉप की स्क्रीन सामने की दीवार पर डिस्प्ले हो गयी जिस पर अभी तक किसी फ़िल्म का दृश्य रुका था। वे हाथ के इशारे से अनेक स्लाइडों को आगे-पीछे और ज़ूम इन-ज़ूम आउट करते रहे। बहुत देर तक मैं उनके नये काम को समझता रहा और मन ही मन चमत्कृत होता रहा। स्लाइडों का यह जादू भरा संसार सिमटते ही मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं उनसे अक्सर मिलते रहना चाहता हूं और उनके बारे में एक ब्लॉग भी लिखना चाहता हूं। उन्होंने सहज ही इजाज़त दे दी। प्रोफ़ेसर ने घड़ी देखी। डिनर का वक़्त हो चला था। उन्होंने भोजन का आग्रह किया जिसे मैंने विनम्रता से टाल दिया और फिर मिलने का वादा कर घर की ओर लौट आया…।

[to be continued..]

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2 विचार “1/ प्रोफ़ेसर का अध्ययन-कक्ष&rdquo पर;

  1. Santosh Kumar Roy कहते हैं:

    प्रोफ़ेसर साहब की दुनिया दिलचस्प है.टेक का वर्चुअल संसार और रीडिंग,राइटिंग,मीटिंग-सीटिंग की
    ऐसी दुनिया हमारी उत्सुकता को बढा देती है. लेखक,पाठक आदि को ऐसी दुनिया अपनी ओर खिचती है.

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